Monday, October 8, 2012


हसीं मोड़ 
अभी कुछ ही कदम चला था मैं 
महत्वाकांक्षा की राह पर 
इक हसीं मोड़ मिला और 
मिली दो चंचल आँखें 
कदम बहके थे ,अरमां दहके थे 
हौले से थामा था हाथ उसका 
खाकर साथ निभाने की कसमें 
हसीं मोड़ मुस्कुराया चंचल आँखें शरमाई 
फिर अभिलाषा भारी हुई चाहत से 
मैंने हौले से छुड़ाया था हाथ उसका 
और चल पड़ा था कहकर -'फिर मिलेंगे..'
हसीं मोड़ सहमा था ,चंचल आँखें बरस गईं ..
मैं बेखबर चल पड़ा था तरक्की की राह पर 
चलता रहा , भागता रहा 
कमाता रहा ,खर्चता रहा 
लुटता रहा , लुटाता रहा ..
एक दिन थककर हाँफ गया ..
जब बारी आई छालों भरे पांवों को सहलाने की 
तो अचानक याद आया वो मोड़ 
और याद आई वो चंचल आँखें .
लौट चला मैं उस राह पर 
जो जा मिलती थी उस मोड़ से 
जब पहुंचा तो पाया सब बदला सा 
वह मोड़ अब रास्ते में बदल गया था 
और चंचल आँखें हो गई थी पराई ..
हाँ जो पौधा हमने लगाया था ,
जिसे सींचा था उसके आँसुओं ने ,
उसपर मुस्कुरा रहे थे दो गुलाब 
मानो कहते हैं उपहास से 
"बहुत देर कर दी "..

2 comments:

  1. वाह बहूत ही उम्दा भाव है कविता के आदमी आज के युग में यही करता है बहूत खूब ........

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