Friday, October 5, 2012

गणपति बप्पा की स्थापना, दस दिन तक उनका घर में निवास, पूजन-प्रसाद यहाँ तक तो सब बढ़िया लगता है..मगर फिर आता है विसर्जन का दिन,
वैसे ही बप्पा को विदा करते हुए मन भरा हुआ होता है उस पर विसर्जन के नाम पर यहां-वहां फैलाए गए निर्माल्य यानि कचरे के ढेर और पेयजल स्तोत्रों को प्रदूषित करती बप्पा की विखंडित प्रतिमाएं आखों में आँसू ही ले आती है | लोकमान्य तिलक जी द्वारा एक पवित्र उद्देश्य से शुरू किए सामूहिक गणेश उत्सव प्रदूषण के इस भयानक मंज़र के रूप सामने आएँगे, ये यदि वे जानते तो इस प्रथा को हरगिज़ शुरू न करते | हमारी धार्मिक मान्यताएं पर्यावरण रक्षा में क्यों कमजोर पड़ जाती है, समझ में नहीं आता. ना तो हम प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ती लेना बंद करते हैं, ना ही उनका आकार छोटा रखना चाहते हैं , ना ही उनका तरीके से विसर्जन करना चाहते हैं..अब इस समस्या का हल तो बप्पा आप ही निकाल सकते हो..मैं तो कहती हूँ क़ि दस दिन शान से घरों में विराजो और अंतिम दिन स्वयं ही अंतर्धान हो जाया करो ..प्रदूषण का संकट ही ताल जाएगा..बप्पा, मेरी सलाह पर विचार जरुर करना ..

Friday, May 4, 2012

आज मन उदास है ....


आज मन उदास है 
सारा परिश्रम व्यर्थ जा रहा
सफलता की नहीं कोई आस है 
आओ सूरज को ढंकते बादलों को देखे 
जो एकजुट होकर होड़ करते है 
सर्व शक्तिमान सूरज से 
और ढँक ही लेते है उसे 
शक्ति को परिश्रम से हरा...

आज मन उदास है 
परिस्थितियाँ प्रतिकूल जा रहीं 
निराशा के गहन तिमिर में 
आशा की नहीं उजास है ..
आओ वृक्षों का उलाहना सहते 
नन्हें पौधों को  देखे 
जो झुक जाते हैं तूफ़ान में 
इसीलिए फिर  से लहलहाते हैं 
बसंत आने पर ...

आज मन उदास है 
उम्रभर दुनियादारी में रमा 
पुण्य न कोई पास है ..
चलो कोई अंधेरी दहलीज़ करें रोशन 
या किसी बिलखते बच्चे को दे 
हंसी की सौगात 
क्योंकि भगवान इन्हीं में बसते हैं 
वे यहीं कहीं मिलते हैं...

भारती पंडित 

Tuesday, April 24, 2012

साहित्यिक सम्मान बनाम....???


  कल एक साहित्यिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला. आजकल अक्सर ऐसा होता है कि बड़ी उमंग से कार्यक्रम में जाती हूँ.. और फिर वहाँ की अव्यवस्था या अस्तरीयता के चलते मन खट्टा हो जाता है .. ऐसा ही कुछ कल भी हुआ.. मंच संचालक की स्क्रिप्ट गड़बड़ा रही थी.. चलो माफ़ किया ..मंच पर अव्यवस्था थी.. वह भी माफ़ किया जा सकता था मगर जो सबसे असहनीय था वो यह कि साहित्यिक सम्मान के लिए जिन  २१ साहित्यकारों को चुना गया था, उनकी पुस्तकें बाहर प्रदर्शित की गई थी..अत्यंत दुःख की बात यह कि तीन-चार  नामचीन लेखकों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी का लेखन एकदम बकवास {क्षमा चाहती हूँ } था और उन्हें ऐसी कृतियों के लिए सम्मानित करना यानि साहित्य का अपमान ही है...
मेरा सर्वाधिक रोष तो उन प्रकाशकों पर है जिन्होंने पुस्तक प्रकाशन के द्वार अच्छे  साहित्यकार के लिए एकदम बंद  कर दिए हैं ,यदि कोई बिना रूपया खर्च किए अच्छा साहित्य भी प्रकाशित करवाना चाहे तो उसे नानी याद आ जाती है.. दूसरी ओर २०-२५ हज़ार की राशि नकद देकर कुछ प्रकाशक बकवास साहित्य भी खुशी से छाप रहे है क्योंकि साहित्य के स्तर को बनाए रखने का ठेका उन्हें नही सौपा गया है...इसी के चलते बेकार साहित्य पुस्तकाकार रूप में आ जाता है और शहर  की आम-ख़ास संस्थाओं के सम्मान समारोह में इन सो कॉल्ड साहित्यकारों को सम्मान बाँट दिए जाते है..
      मेरा दूसरा प्रश्न है उन संस्थाओं  से जो इस तरह के सम्मान समारोह आयोजित करती हैं.. क्या ये समारोह केवल खाना पूर्ति के लिए ही आयोजित किए जाते है या वास्तव में अच्छे साहित्य से इनका कोई लेना-देना भी होता है? या आबंटित बजट को खर्च करने का रास्ता बनाया जाता है इनके ज़रिए? क्या पुस्तकों की जाँच के लिए समिति बनानी जरुरी नही है? सम्मान लायक पुस्तक न मिलने पर  संस्था के द्वारा यह विज्ञप्ति क्यों नहीं जारी की जाती कि " इस वर्ष कोई भी पुस्तक सम्मान लायक नही पाई गई? " क्या साहित्य के स्तर की रक्षा हेतु यहकदम उठाना जरुरी नहीं समझा जाता? 
 आजकल किताबें नही  पढी जाती यह गुहार लगाने वाले इन साहित्यकारों और इन संस्थाओं को यह समझना चाहिए कि बेकार साहित्य की बहुलता में अच्छा साहित्य कहीं गुम हो रहा है और जब पाठक के पल्ले ऐसी पुस्तकें पड़ती हैं तो वह पुस्तकों से दूर भानागे का ही प्रयास करता  है.. 
स्वांत सुखाय लिखने  और भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अधिकार सबको है मगर कुंदन बने बिना साहित्य के आभूषण में जड़कर उसे बदसूरत बनाने का अधिकार  किसी को नहीं मिलना चाहिए..

Monday, April 16, 2012

सपनों की सुबह

हर सुबह
जब दफ्तर जाती हुई भीड़ का एक हिस्सा बनकर
दो-चार होती हूँ सड़क के ट्रेफिक से
तब अंतर्मन में दबी एक सुप्त सी आशा
हौले से सिर उठने लगती है ..
जब कभी देखती हूँ किसी को
सुबह-सुबह जोगिंग करते
या बालकनी में बैठ चाय सुड़कते ,
अखबार पलटते ..तो
ईर्ष्या की नन्ही सी चिंगारी सुलग जाती है मन में
और फिर दबी सी वह आशा
फिर सिर उठाने लगती है ..
क्या कभी ऐसा होगा जब
मेरा समय होगा सिर्फ मेरा अपना
और होगा सब कुछ वैसा जैसे मैं चाहूँ..
जब मैं सोना चाहूँ, न हो अलार्म की टन-टन
जब मैं कुछ पढ़ना चाहूँ , न हो बर्तनों की खडखडाहट
ना हो सुबह की आपाधापी
ना हो शाम की खींचा तानी
बस घर हो सपनों के घर जैसा और
मैं बन जाऊं उस घर की रानी
बस के धचके के साथ ही जाग जाती हूँ
अपने टूटे सपने के किरचें समेटे
टूटी आशा को फीकी हँसी में समेटते
जानती हूँ मेरी ये सोच बेमानी है,
हर मिडिल क्लास नारी की
बस यही कहानी है ..
जहाँ सपने सिर्फ सपने होते हैं
और यथार्थ हर सपने पर भारी है ..
उस पर नारी की दोहरी जिम्मेवारी है
सब कुछ निभाकर भी बेचारी है ...
रोज सुबह इसी सपने के साथ
शुरू करती हूँ दिन अपना
और फिर दिखा देती हूँ माचिस उसे ..
और.. हर नई सुबह फिर थाम लेती हूँ
उम्मीद भरे सपने का दामन
की वो सुबह कभी तो आएगी ..

भारती पंडित

Friday, March 30, 2012

राम नवमी के पावन अवसर पर मेरे द्वारा रचित संक्षिप्त रामायण आपके सामने प्रस्तुत है |

संक्षिप्त रामायण
शरयू तटे अयोध्या नगरी ,राजा दशरथ जिसके प्रहरी |
तीन रानियाँ सुघड़- सलोनी ,राज मंत्री जिनके बहुज्ञानी ||

पुत्र प्राप्ति हित यज्ञ कराये, चार सुयोग्य पुत्र तेहि पायो |
गुरु वशिष्ठ ने शिक्षा दीन्ही ,बने कुमार योग्य अति ज्ञानी ||

विश्वामित्र आए दरबारा,लियो साथ द्वय ज्येष्ठ कुमारा |
दंडक वन में करे विहारा,करे त्राटिका असुर संहारा ||

मिथिला नंदिनी जनक कुमारी ,हुआ स्वयंवर जिसका भारी |
शिव धनुष्य पर डोर चढ़ाए ,जनक कुमारी पत्निवत पाए ||

बढे राम गुरु अनुमति पाई , शिव धनुष्य पर डोर चढ़ाई |
हर्षित जनक नंदिनी आई , राम कंठ जयमाल चढ़ाई ||

दशरथ बहुविधि करे विचारा, राज-पाट सब राम सम्हारा |
दासी मंथरा दुर्बुद्धि जानी , कैकयी भाई स्वयं अज्ञानी ||

राज-पाट सब भरत संहारे, राम अभी जाए वन द्वारे |
आर्तनाद करते रहिवासी , व्यथित अयोध्या छाई उदासी ||

चले राम पितु आज्ञा पाए ,सिया-लखन राम संग आए |
पंचवटी में कुटी बनाई,हर्षित मुदित सिया बहुताई ||

शूर्पनखा विचरती थी वन में , राम-लखन भाये तन-मन में |
प्राण जानकी हरने आई,शूर्पनखा ने नाक कटाई ||

शूर्पनखा भागी बंधुमुख , व्यथा कहे रावण के सम्मुख |
रावण मृग सुवर्ण पहुँचायो ,राम-लखन कुटि दूर करायो ||

भिक्षु वेश रावण करि जाई, सीता हरण दुष्ट करि पाई |
व्यथित राम भटके वन-वन में ,हनुमत मिले साधु के वसन में ||

संग सुग्रीव मित्रता कीन्हीं , अरज सभी उसकी सुन लीन्हीं |
बाली मार राज पुनः लीनो ,हनुमत खबर सिया की दीन्हों ||

राम जलधि उर सेतु बनाए,सिया मुक्ति हित दूत पठाए |
गर्वित रावण करे हुँकारा, युद्ध यही बस हेतु हमारा ||

हुई गर्जना वीरों की तब , दिशा चहुँ होती थी झंकृत |
गूँजे बहुल शस्त्र टंकारा, चहु दिसी मचाता हाहाकारा ||

डस दिन भयो युद्ध अति भारी ,सकल असुर सेना संहारी |
रघुवर बाण अचूक चलायो, मृत्यु द्वार रावण पहुँचायो ||

रावण मरे मुदित हुई लंका ,सिया-राम का बजता डंका |
प्रिया जानकी सम्मुख आई, हर्षित मुदित हुए रघुराई ||

सिया-लखन सह देस पधारे ,अवध नगर के भाग सँवारे |
मंगल गाए अवध नर-नारी ,रघुवर चरण लायो सुख भारी ||

bharti pandit


Tuesday, March 27, 2012

यादें

जीवन की हलचल में कोमल से कुछ पल
छूते है दिल को और बनती है यादें |
समतल सी राहों में नुकीले से पत्थर
चुभते हैं पग में और बनती है यादें |
गर्म दुपहरी में एक ठंडा सा झोंका
सहलाए तन को तो बनती है यादें |
चन्दा की चमचम को नटखट सा बादल
ढंकता है आकर तो बनती है यादें |
मीठी और कड़वी ,खट्टी और तीखी
रसना के स्वादों सी होती हैं यादें |
अपनाए उनको जो मीठी हैं यादें
दिल को दुखाए ,वो यादें भुला दें|

यादें

जीवन की हलचल में कोमल से कुछ पल
छूते है दिल को और बनती है यादें |
समतल सी राहों में नुकीले से पत्थर
चुभते हैं पग में और बनती है यादें |
गर्म दुपहरी में एक ठंडा सा झोंका
सहलाए तन को तो बनती है यादें |
चन्दा की चमचम को नटखट सा बादल
ढंकता है आकर तो बनती है यादें |
मीठी और कड़वी ,खट्टी और तीखी
रसना के स्वादों सी होती हैं यादें |
अपनाए उनको जो मीठी हैं यादें
दिल को दुखाए ,वो यादें भुला दें|