Saturday, December 23, 2017

एक संदेशपरक फिल्म सांकल 
यह फिल्म उस फिल्मकार की फिल्म है जो मुख्यधारा के अकूत धनी फिल्मकार नहीं है मगर समाज के अभिशप्त मुद्दों पर जागरूकता का आह्वान करने को प्रतिबद्ध है| यह फिल्म बड़ी कठिनाइयों से जूझते हुए अपने मुकाम तक पहुँची है और उसके बाद भी व्यावसायिक फिल्मों के चक्रव्यूह के चलते इसे वितरक और सिनेमा हॉल दोनों ही मिलने में खासी दिक्कतों का सामना करना पडा है| बावजूद इसके यदि इसकी स्क्रीनिंग हो पाई है तो इसके लिए निर्माता-निर्देशक की जीजिविषा को सलाम|
यह कहानी है एक ऐसे गाँव की जहाँ पुरानी सड़ांध मारती परंपराएँ स्वतंत्रता के पचास दशक बाद भी उसी तरह से मौजूद हैं| इस गाँव के वाशिंदों के लिए औरत केवल देह मात्र है, उपभोग की वस्तु मात्र है जिसे वे अपनी सुविधानुसार अदल-बदल सकते हैं, इस घर से उस घर बिठा सकते हैं| स्त्री के हिस्से शिक्षा नहीं, सहारा नहीं और उससे भी बड़ी बात यह कि समाज में अपनी स्थिति को स्त्रियाँ स्वयं किस तरह से आत्मसात कर लेती हैं और “यही हमारी नियति है” मानकर हर दिन का नरक भोगती रहती है, इस कटु सत्य को बेहतरी से उजागर करती है यह फिल्म|
कहानी है जैसलमेर के पास के एक गाँव की जहाँ एक बिरादरी की उम्रदराज़ होती लड़कियों की शादी अपनी ही बिरादरी के कम उम्र लड़कों से कर दी जाती है| प्रकट में तो इस प्रथा का उजला पक्ष यह दिखाया जाता है कि ऐसा करने से बिरादरी की लडकियाँ अनब्याही न रहेंगी मगर काला सच यह है कि नई बहू के आने पर अपनी स्वर्ग सिधार चुकी या उम्रदराज़ हो चुकी पत्नियों से विकल घर के मर्दों के लिए मानो रेगिस्तान में बसंत आ जाता है और हरेक उसे अपनी बपौती मानकर अपनी क्षुधा शांत करता रहता है| ऐसी ही प्रथा की शिकार है युवा अबीरा और उसका नन्हा पति केसर...दोनों ही बेमेल शादी के जाल में उलझा दिए जाते हैं, बेचारे केसर को बचपन में ही एक बेटी का बाप बना दिया जाता है, उस समय जब वह इतना अबोध होता है कि उसे यौन रिश्तों का अ,ब,स तक पता नहीं होता|
किशोरावस्था में आने के बाद केसर को असलियत पता चलती है| इस बीच उसके मन में अपनी पत्नी के प्रति प्रेम जन्मता है, वह सशरीर उससे एकाकार भी होता है| पर फिर उनकी ज़िन्दगी में एक तूफ़ान आता है जो उनके जीवन को तहस-नहस कर देता है|
फिल्म के तकनीकी पक्ष की बात करें तो यह फिल्म पूरी तरह से चेतन शर्मा और तनिमा भट्टाचार्य की फिल्म है| चेतन (केसर) के शरीर का हर फ्रेम अभिनय करता है, अपने आप को व्यक्त करता है| इस युवा में भारी संभावनाएँ नज़र आती हैं| बढ़े हुए बालों में वह बेहद आकर्षक लगा है| तनिमा हर फ्रेम में बहुत खूबसूरत लगी है| उसके हिस्से संवाद कम ही थे और उन्हीं मूक फ्रेम्स में वह बेहद निखरकर आई है| आँखों, भौहों और लरजते ओंठों से दृश्य के भाव को अंज़ाम देना अद्भुत है| हाँ, संवाद अदायगी उतनी प्रभावी नहीं हो पाई है| बाकी पात्र ठीकठाक है| मिलिंद गुणाजी हर शॉट में केसर के सामने फीके लगे|
दृश्यांकन भी बहुत सधा हुआ और कलात्मक है| रेत के टीलों की सुन्दरता को बखूबी कैमरे में कैद किया गया है| तनिमा और केसर के क्लोजअप शॉट्स भी बहुत बेहतर बन पड़े हैं|
गीत दिल दरिया बेहद मधुर बन पड़ा है जो लगातार जुबां पर चढ़ा रहता है| रिश्तों की सांकल गीत भी अच्छा बन पड़ा है| गीतों का फिल्मांकन प्रभावी है| हाँ, दृश्यों में पार्श्व संगीत कहीं कहीं बेमेल लगा है|
संवाद फिल्म का थोड़ा कमज़ोर पक्ष है| इस तरह की कहानी में अत्यंत प्रभावशाली संवादों की अपेक्षा थी मगर बेहद साधारण तरीके से इन्हें निभा दिया गया है| अंतिम संवाद – खुदा ने औरतों को मर्दों के हाथों का खिलौना बनाकर भेजा है...इतनी बार सुना जा चुका है कि सीन का प्रभाव जाता रहा|
इसी तरह थोड़ा काम फिल्म की गति पर किया जाना था| जिन दृश्यों पर थोड़ा ठहरकर सघन भाव दिखाने की आवश्यकता थी वे अचानक जल्दी से गुज़र जाते हैं| केसर और अबीरा के बीच पनपते प्रेम को दिखाने के लिए कुछ और दृश्यों की आवश्यकता थी चूंकि प्रेम शरीर नहीं आत्मा भी होता है...मगर इन्हें केवल शारीरिक संसर्ग का दृश्य दिखाकर छोड़ दिया गया है| दुखभरे दृश्य भी इतनी तेज़ी से गुज़रते हैं कि आँसू आँखों को केवल महसूस होते हैं, बाहर नहीं आते|
स्क्रीन प्ले एक-दो जगह उलझाता है मसलन हत्या करने के बाद भाग जाने पर भी पुलिस केसर की तलाश कैसे नहीं करती? साथ ही केसर दस-बारह साल की आयु में स्कूल छोड़ता है यानी उसे पढ़ना आना चाहिए, मगर पहले दृश्य में वह यह कहता नज़र आता है कि मैं तो इस पुस्तक को पढ़ नहीं सकता...(संभव है निर्देशक इसके द्वारा शिक्षा क्षेत्र की विसंगतियों की ओर भी इशारा करना चाहते हो)
शायद यह फिल्म किसी सत्य घटना पर आधारित है पर बार-बार अबीरा का परिस्थिति के सामने विवश होकर घुटने टेकना विचलित करता है...काश कि वह विद्रोह कर पाती...
बहरहाल स्वतंत्र सिनेमा के क्षेत्र में सांकल को एक अच्छा प्रयास कहा जाएगा जिसने इतने गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान दिलाने की एक बेहतर पहल की है| इसे सभी को एक बार ज़रूर देखना चाहिए ताकि इस पहल की गूँज दूर तक जा सके|
निर्माता-निर्देशक देदीप्य जोशी को बधाई|

Sunday, November 19, 2017

   
तुम्हारी सुलू – दूसरा दिन, दूसरा शो
फिल्म के प्रोमो देख-देखकर ही उत्सुकता जाग उठी थी इस फिल्म को देखने की...आखिरकार दूसरे दिन एंट्री ले ही ली थिएटर में...ट्रेलर और अखबार की समीक्षा से कहानी का अंदाज़ तो लग ही गया होगा, पर कुछ महत्वपूर्ण बातें जरूर बताना चाहूँगी इस फिल्म के बारे में|
सबसे पहले तो यह फिल्म शिक्षा व्यवस्था की उस पारंपरिक और आउटडेटेड होने के बावजूद आज भी व्याप्त सोच पर करारा व्यंग्य करती है जहाँ भले ही कितने ही हुनर हो व्यक्ति में, यदि तीन घंटे के पेपर में सफलता नहीं हासिल की यानी बारहवी का प्रमाणपत्र हासिल नहीं किया, तो जीवन बेकार है| तो इस फिल्म की नायिका सुलू उर्फ़ सुलोचना ऐसी ही एक बारहवी फेल छात्रा हैं, जो खासी हुनरमंद और नए-नए कामों की आज़माइश के लिए उत्साहित हैं मगर बारहवी फेल का तमगा उसका साथ नहीं छोड़ता और हर घर की ही तरह यहाँ भी उसकी लड़ाई उसके अपनों से यानी पिता, बहनों और जीजाओं से ही है| और हमारी नायिका इस सत्य के प्रति स्वीकार भाव रखते हुए रेडियो जॉकी की नौकरी का प्रस्ताव मिलने पर पूछती है, बारहवी फेल हूँ मैं, चलेगा न?  
   दूसरी महत्वपूर्ण बात जिसकी ओर यह फिल्म इशारा करती है, वह है हमारे यहाँ व्यवसाय में पदानुक्रम का लागू होना यानी कुछ पेशे गर्व के भाव से देखे जाते हैं और कुछ को हेय माना जाता है| रेडियो पर रात का शो एंकर करने का प्रस्ताव है सुलू के पास, और काम भी यह कि दिन भर के थके-हारे कामगार लोग उससे कुछ मज़े की बातें कर सके| सुनने में यह अटपटा लगता है मगर गहराई से सोचे तो हमारे यहाँ भावनात्मक स्वास्थ्य की स्थिति इतनी खराब है कि लगातार परेशानियों से जूझते परिवारों के लिए घर तो शायद ही सुकून का स्थल होते हो| संवाद तो लगभग खत्म से हैं| कोई हमारी बात सुन भर ले, इसका तक अकाल पड़ा रहता है| यहाँ एक और बात सुलू स्थापित करती है कि गन्दगी लोगों के मन में होती है, काम की अवधारणा में नहीं और इसी सोच के साथ सुलू इस शो को जन-सामान्य का शो बना डालती है मगर उसकी बहनें रात के शो को गंदा काम कहकर उसका मनोबल नीचे गिराने का पूरा प्रयास करती हैं| वे उच्च शिक्षित हैं अतः उनकी नौकरी, उनका टूर पर जाना सम्माननीय है मगर सुलू का रात के शो के लिए घर से बाहर जाना हेय काम है|
   तो कहानी हमारे-आपके जैसे मध्यम वर्ग के घर की ही है, फिल्म के बहुत से फ्रेम में बार-बार हम अपने आप को जीते हुए देखते हैं| पति-पत्नी के बीच की नोंक-झोंक हो, प्यार के लम्हे हो या बहस...सब कुछ बेहद जीवंत बन पड़ा है| स्वस्थ हास्य कैसे चुटीले संवादों द्वारा उत्पन्न किया जा सकता है, इसका हर सीन में अहसास होता है| जेंडर के मुद्दे जैसे पत्नी के नौकरीशुदा होने के बाद भी घर की देखभाल न कर पाने को लेकर बेवजह अपराधी महसूस करना, पति का गुस्सा झेलना आदि भी बार-बार उद्वेलित करते हैं, वहीं पति-पत्नी के बीच की केमिस्ट्री मन को छूती है| विद्या का अभिनय तो दिनोंदिन निखरता जा ही रहा है, मानव कौल भी एकदम परफेक्ट है अपनी भूमिका में| नेहा धूपिया ने भी प्रभावित किया|
हाँ, अंत थोड़ा उलझाता है...नौकरी छोड़ कर बैठे पति को काम दिलवाना भी पत्नी की ज़िम्मेदारी क्यों है? और इस्तीफ़ा देने आई सुलू बिजनेस का नया आइडिया मिलने के बाद भी फिर आरजे कैसे बन जाती है... उस शॉट पर तो दिल धड़क रहा था कि यदि इसने घबराकर नौकरी छोड़ दी तो??? सबसे पहले इसके निर्देशक को ट्वीट करके पूछूंगी कि भाई क्या सोचकर ऐसा करवाया सुलू से? पर इसकी नौबत नहीं आई...

तो एक बार जरूर देखें तुम्हारी सुलू और सपरिवार देखें...सुरेश त्रिवेणी ने इसके हर फ्रेम को खूबसूरती से उकेरा है जिसे जरूर देखना चाहिए...     

Thursday, March 24, 2016

तुम केवल



तुम केवल
तुम केवल अक्षरों की पहचान को ही
पढ़ने का नाम देते हो
मगर मैं इसके परे भी
पढ़ पाता हूँ बहुत कुछ
पिताजी के गुस्साने पर
माँ की आँखों का दर्द
भाई के बहानों में छिपा झूठ
या पड़ोसी के बेटे की कुटिलता
और रिश्तों में पसरी तटस्थता,
हाँ, यह भी पढ़ पाता हूँ मैं
कि मुझे मूल्यों का पाठ पढ़ानेवाले
खुद कितने मूल्य सहेजते हैं|
मगर तुम्हारे लिए इतना पर्याप्त नहीं
पढ़ने के कौशल के लिए,
तुम तो आज भी बस
अक्षरों की ही पहचान को
पढ़ने का नाम देते हो|
                                                             - भारती पंडित

Tuesday, July 30, 2013



 पदचिह्न 

उम्र छोड़ती जाती है  पदचिह्न
चेहरे पर हमारे कदम  दर कदम 
झुर्रियाँ , झाइयाँ ,धब्बे बनकर 
शायद  ही छुपा पाते हैं  प्रसाधन  उन्हें 

उम्र छोड़ती जाती है पदचिह्न 
शरीर पर हमारे कदम दर कदम 
मोटापा , रक्तचाप,संधिवात बनकर 
शायद ही मिटा पाती है दवाएँ जिन्हें 

कुछ पदचिहन छोड़ती है उम्र 
समझ पर भी कदम दर कदम 
बड़प्पन और सुन्दर विचार बनकर 
नहीं पड़ती जरुरत  छिपाने की जिन्हें 
क्योंकि 
जीवन सार्थक कहलाता है इनके होने पर ही 

भारती पंडित 

Wednesday, July 17, 2013




   अगला जन्म 
सड़क के किनारे बनी मजदूर बस्ती में वह अपने टूटे-फूटे झोंपड़े में बच्चों को बहला रही थी| भोजन के नाम पर बर्तन में चावल के चंद दाने थे | सोचती  थी बातों के बहलाव-फुसलाव के साथ परोसे गए चावल उनका पेट भरने में कामयाब हो जाएंगे | इतने में बड़ा बेटा बोला ," माँ , क्या अगला जन्म भी होता है?" 
वह बोली ,"हाँ बेटा , सुना तो है , क्यों ?
बेटा बोला ," फिर तो मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा की अगले जन्म में मुझे इंसान नहीं, सामने वाले बंगले का कुत्ता बनाना | पता है माँ , वह कुत्ता रोज़ दूध-बिस्कुट, अंडे-ब्रेड-मांस  खाता है | रोज़ महंगे शैम्पू से नहाता है और कार में भी घूमता है | और तो और बीमार पड़ जाने पर डॉक्टर उसे खुद देखने आते हैं | कुत्ता होकर कैसी ठाठ की जिन्दगी  है न उसकी ?"
उसकी आँखे फटी की फटी रहा गई थी | कानों में बच्चे के शब्द  भांय-भांय कर रहे थे| उसे लगा मानो सामने बैठा बच्चा अचानक कुत्ते की शक्ल का हो गया और भौं-भौं करता हुआ सामने वाले बंगले में घुस गया |


Wednesday, May 15, 2013

पिंजरे पैमानों के


अपने लिए आज़ादी की मांग करता मैं
जाने-अनजाने गढता जाता हूं
दूसरों के लिए पिंजरे पैमानों के
उठने-बैठने हंसने-रोने के
चरित्र व्यवहार बोलचाल के पैमाने
और सतत अभिलाषी रहता हूं कि
मेरे अपने सहज सहर्ष 
कैद होते जाए मेरे पैमानों में
मेरे जैसे मेरे मुताबिक
उनकों अपने सांचों में ढालता मैं
अक्सर भुला देता हूं
कि आज़ादी की एक मांग उनकी भी थी ..

भारती पंडित

Sunday, February 3, 2013

जीवन की पाठशाला में
भले ही न सीख सका मैं हिज्जे वर्णमाला के
अपनों से संवाद भली भाँति निभा रहा हूँ मैं ।
न पढ़ पाया चंद पन्ने किताबों के
किसी के दर्द को आँखों में पढ़ पाता हूँ मैं ।
अंकों की समझ शून्य थी मेरी
पर रिश्तों का गणित निभा जाता हूँ मैं ।
चाहे कर ना पाया होमवर्क कभी
माँ का हाथ हर काम में बंटाता हूँ मैं ।
प्रगति पत्रक में रहा अनुत्तीर्ण छात्र मैं
जीवन की पाठशाला में होनहार कहा जाता हूँ मैं ।
भारती पंडित
 

Thursday, January 17, 2013




ये शहर 

पौ फटते ही शुरू हो जाती है 
चहलकदमी शहर की 
आँख खुलते ही नज़र आती है 
गहमागहमी शहर की |
भागती बसें, दौड़ते रिक्शे ,
घिसटते कदम, लरजती साइकिलें
आदमी,औरत,मजदूर,बच्चे 
अपनी राहों पर चल पड़ते सच्चे ,
दिन ढले लौटते पंख पसारे 
बेनूर,निस्तेज,थके -हारे
रात गहराती है,सिमटती है ज़िन्दगी
 सुबह की उम्मीद में ढलती है ज़िन्दगी |
इनकी शाम के साथ  रौशन होती है एक सुबह
बारिश में बढ़ते कुकुरमुत्तों की तरह
बिखरती मस्तियां, छलकते है जाम 
उमड़ते हैं सपने , ढलती है शाम 
क्लब पार्टियों की रंगीन रातें 
वो बिजनेस की डीलिंग, सौदे की बातें |
कुछ ऐसे ही रंगों से ढलती है रात 
फिर उनकी सुबह को देती शुरुआत 
चुपके से कह जाती है बात इतनी 
कि उनकी सुबह से है रात इनकी |
  

Tuesday, October 23, 2012

एक दिवसीय साम्राज्य





बिट्टू को समझ में ही नहीं आ रहा था कि आज दादी से लेकर चाची, बुआ सबको हो क्या गया है. रोज तो उसे खूब भाव मिलता था, उसकी मान-मनुहार की जाती थी, उसके पहले  हुई तीन बहनों को तो कोई गिनती में गिनता  भी नहीं था . दादी तो सुबह होते ही उसके हाथ में दूध से भरा गिलास पकडाती थी ,साथ होता था मलाई लगा टोस्ट और बहनों को चाय से आधे भरे गिलास देकर काम पर लगा दिया जाता था . लड़की की जात हो, काम करना सीखोगी तभी ससुराल में निभोगी.. नहीं तो नाक कटाएंगी निगोड़ी.. जैसे प्रवचनों से ही बहनों का नाश्ता भी हो जाता था.. ..
पर आज तो रंग ढंग ही निराले थे. सुबह ही तीनों को बढ़िया उबटन लगाकर नहलाया गया, बालों की सुन्दर चोटी की गई, नए कपडे पहनाकर ऐसे तैयार किया गया मानो कोई त्योहार हो. बिट्टू की ओर तो किसी ने ध्यान ही नहीं दिया . देखते ही देखते घर में और भी लड़कियां जमा हो गई. पिताजी ने सबके पाँव पूजे, गरमा-गरम खीर पूरी खाने को दी. बिट्टू ने खीर के कटोरे को हाथ लगाया तो पिताजी ने आँखे लाल-पीली करके कहा," दस मिनिट सबर नहीं हैं, पहले कन्या तो खा ले.."
सारी कन्याएं घर-घर घूमती फिरी. यहाँ-से न्योता, वहाँ से न्योता ... खा-खाकर अघाई, खूब सिक्के, तरह तरह की चीजें इकठ्ठी कर घर ले आई. 
बिट्टू उदास हो घर के बाहर बैठा था कि पास का गुड्डू आया," क्या हुआ बोंस, परेशान क्यों हो?" बिट्टो ने मन की दुविधा कह डाली. मन में डर था कि कही उसका राजसिंहासन डोल तो नहीं रहा है..गुड्डू ठठाकर हंस पडा.." अरे चिंता मत कर छोरे, आज नवमी है ना ..देवी माँ का दिन.. बस एक ही दिन का राज -पाट है इनका .. कल से फिर जुट जाएँगी अपने काम-काज में.. अगली नवमी के इन्तजार में.."
. एक कड़वा सच..और सचमुच ही शाम होते ही घर-घर में कठोर पुकार मचने लगी.. अरी निगोड़ी.. खेलती ही रहेगी या माँ के साथ हाथ भी बंटाएगी?
 बिगुल बज गया था.. एक दिवसीय साम्राज्य के अंत का ...
भारती पंडित 

Monday, October 8, 2012


हसीं मोड़ 
अभी कुछ ही कदम चला था मैं 
महत्वाकांक्षा की राह पर 
इक हसीं मोड़ मिला और 
मिली दो चंचल आँखें 
कदम बहके थे ,अरमां दहके थे 
हौले से थामा था हाथ उसका 
खाकर साथ निभाने की कसमें 
हसीं मोड़ मुस्कुराया चंचल आँखें शरमाई 
फिर अभिलाषा भारी हुई चाहत से 
मैंने हौले से छुड़ाया था हाथ उसका 
और चल पड़ा था कहकर -'फिर मिलेंगे..'
हसीं मोड़ सहमा था ,चंचल आँखें बरस गईं ..
मैं बेखबर चल पड़ा था तरक्की की राह पर 
चलता रहा , भागता रहा 
कमाता रहा ,खर्चता रहा 
लुटता रहा , लुटाता रहा ..
एक दिन थककर हाँफ गया ..
जब बारी आई छालों भरे पांवों को सहलाने की 
तो अचानक याद आया वो मोड़ 
और याद आई वो चंचल आँखें .
लौट चला मैं उस राह पर 
जो जा मिलती थी उस मोड़ से 
जब पहुंचा तो पाया सब बदला सा 
वह मोड़ अब रास्ते में बदल गया था 
और चंचल आँखें हो गई थी पराई ..
हाँ जो पौधा हमने लगाया था ,
जिसे सींचा था उसके आँसुओं ने ,
उसपर मुस्कुरा रहे थे दो गुलाब 
मानो कहते हैं उपहास से 
"बहुत देर कर दी "..

Friday, October 5, 2012

Aalekh

भूख छपास की
आइए आज भूख की बात करते है..भूख केवल पेट की ही नहीं होती.. एक भूख होती है छपास की और मंच की. इस भूख को एक बीमारी भी कह सकते है, जिसका वाइरस अधिकतर साहित्यकारों को और कलाकारों को अपनी चपेट में लेता है.. कलाकार भी वे जिनके ढोल में पोल होती है. यह वाइरस धीरे-धीरे दिमाग में घर करता जाता है और सारे व्यक्तित्व पर हावी होता जाता है. इस भूख से पीड़ित व्यक्ति की आत्माभिमान करने के शक्ति बहुत बढ़ जाती है.. उसे अपनी कला पर आत्मविश्वास नहीं, अति विश्वास हो जाता है. वह दूसरों की सुनना बिलकुल बंद कर देता है और अपनी ढपली-अपना राग आलापना शुरू कर देता है. किसी समारोह में जाने पर उसकी पहली कोशिश होती है मंच पर चढ़कर माइक हथियाने की.. यदि सरलता से मिल जाए तो ठीक, अन्यथा वह "बस जरा सा कुछ कहना है" कहकर मंच पर चढ़ जाता है. कई बार तो इस मंच के लिए आयोजकों के कोपभाजन बनने से भी नहीं डरता . यह दीवानगी तब और बढ़ जाती है, जब समारोह को कवर करने रिपोर्टर्स आते है.. फिर तो धक्का-मुक्की करके ऐसी जगह पहुचने का प्रयास होता है कि कल के अखबार में मुखड़ा उनका ही चमकना चाहिए.. चाहे समारोह में कोई भागीदारी हो या न हो.. जब बहुत प्रयासों के बाद भी फोटो में जगह नहीं मिल पाती, तो सेटिंग करने से बाज नहीं आते.. और भगवान की दया से यदि किसी समारोह में कोई कविता सुनाने(मुख्य अतिथि के आने में देर होने पर) या गीत गाने का मौका मिल जाए, तो जोड़-तोड़ करके ,अपने प्रभाव या पद का उपयोग करके ऐसी जुगाड़ फिट करते है कि समारोह चाहे कोई भी हो, मुख्य धारा के समाचार में अपना नाम और फोटो डलवाकर ही दम लेते है.. आयोजक बेचारा अगले दिन का अख़बार देखकर बाल नोचकर रह जाता है .. उसके आयोजन के समाचार का बदला रूप देखकर सिवाय मन ही मन गाली देने के कर भी क्या सकता है .. मगर अगली बार उसे अपने आयोजन में कदम भी न रखने देने की कसम खा लेता है..
ये तो हुए लक्षण .. अब सवाल यह कि इस बीमारी का इलाज क्या हो..कई विशेषज्ञों से चर्चा करने के बाद पता लगा कि इस बीमारी का सिर्फ एक इलाज है और वो है अपने विषय में पारंगत होना.. जब मन में ज्ञान गंगा बहने लगेगी, तो व्यक्ति पठन-मनन में रूचि लेने लगेगा , जिससे संभवतः उसके मन की मलिनता दूर हो जाए और वह आत्म मंथन करने में सक्षम हो जाए. अपने आप को उस स्तर तक उठाने का प्रयास करने लगे, जब छपने के लिए उसे जोड़-तोड़ न करने पड़े, वरन लोग स्वयं उसके पीछे आने लगे..
खुद को कर इतना बुलंद कि आसमां लगे कमतर
उधारी से न भर दामन, बना खुद ही को बेहतर..
भारती पंडित
इंदौर

Pls think




चार दिनों से घर का नल लीक कर रहा है,प्लंबर के निहोरे कर-करके परेशान हूँ मगर वह है कि जबरदस्त भाव खा रहा है, खाए भी क्यों नहीं, पूरी कॉलोनी में अकेला ही है वह जो यह काम करता है..आजकल कोई भी पुश्तैनी काम जारी नहीं रखना चाहता, उसने भी आपने बेटे को बड़े स्कूल में डाला है, अफसर बनाने को..जरा कल्पना करें अगले २० वर्ष बाद की जब सामने खड़ी होगी अफसरों की भीड़ और न तो कारीगर मिलेगा, न प्लंबर..न बढई..न लोहार..क्या इनके न रहते सुव्यवस्थित घर केवल रूपए के बल पर बन सकेगा? क्या इन्हें परंपरागत व्यवसायों में बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए?  क्या इनके काम को आदर से नहीं देखना चाहिए?
.
गणपति बप्पा की स्थापना, दस दिन तक उनका घर में निवास, पूजन-प्रसाद यहाँ तक तो सब बढ़िया लगता है..मगर फिर आता है विसर्जन का दिन,
वैसे ही बप्पा को विदा करते हुए मन भरा हुआ होता है उस पर विसर्जन के नाम पर यहां-वहां फैलाए गए निर्माल्य यानि कचरे के ढेर और पेयजल स्तोत्रों को प्रदूषित करती बप्पा की विखंडित प्रतिमाएं आखों में आँसू ही ले आती है | लोकमान्य तिलक जी द्वारा एक पवित्र उद्देश्य से शुरू किए सामूहिक गणेश उत्सव प्रदूषण के इस भयानक मंज़र के रूप सामने आएँगे, ये यदि वे जानते तो इस प्रथा को हरगिज़ शुरू न करते | हमारी धार्मिक मान्यताएं पर्यावरण रक्षा में क्यों कमजोर पड़ जाती है, समझ में नहीं आता. ना तो हम प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ती लेना बंद करते हैं, ना ही उनका आकार छोटा रखना चाहते हैं , ना ही उनका तरीके से विसर्जन करना चाहते हैं..अब इस समस्या का हल तो बप्पा आप ही निकाल सकते हो..मैं तो कहती हूँ क़ि दस दिन शान से घरों में विराजो और अंतिम दिन स्वयं ही अंतर्धान हो जाया करो ..प्रदूषण का संकट ही ताल जाएगा..बप्पा, मेरी सलाह पर विचार जरुर करना ..

Friday, May 4, 2012

आज मन उदास है ....


आज मन उदास है 
सारा परिश्रम व्यर्थ जा रहा
सफलता की नहीं कोई आस है 
आओ सूरज को ढंकते बादलों को देखे 
जो एकजुट होकर होड़ करते है 
सर्व शक्तिमान सूरज से 
और ढँक ही लेते है उसे 
शक्ति को परिश्रम से हरा...

आज मन उदास है 
परिस्थितियाँ प्रतिकूल जा रहीं 
निराशा के गहन तिमिर में 
आशा की नहीं उजास है ..
आओ वृक्षों का उलाहना सहते 
नन्हें पौधों को  देखे 
जो झुक जाते हैं तूफ़ान में 
इसीलिए फिर  से लहलहाते हैं 
बसंत आने पर ...

आज मन उदास है 
उम्रभर दुनियादारी में रमा 
पुण्य न कोई पास है ..
चलो कोई अंधेरी दहलीज़ करें रोशन 
या किसी बिलखते बच्चे को दे 
हंसी की सौगात 
क्योंकि भगवान इन्हीं में बसते हैं 
वे यहीं कहीं मिलते हैं...

भारती पंडित 

Tuesday, April 24, 2012

साहित्यिक सम्मान बनाम....???


  कल एक साहित्यिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला. आजकल अक्सर ऐसा होता है कि बड़ी उमंग से कार्यक्रम में जाती हूँ.. और फिर वहाँ की अव्यवस्था या अस्तरीयता के चलते मन खट्टा हो जाता है .. ऐसा ही कुछ कल भी हुआ.. मंच संचालक की स्क्रिप्ट गड़बड़ा रही थी.. चलो माफ़ किया ..मंच पर अव्यवस्था थी.. वह भी माफ़ किया जा सकता था मगर जो सबसे असहनीय था वो यह कि साहित्यिक सम्मान के लिए जिन  २१ साहित्यकारों को चुना गया था, उनकी पुस्तकें बाहर प्रदर्शित की गई थी..अत्यंत दुःख की बात यह कि तीन-चार  नामचीन लेखकों को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी का लेखन एकदम बकवास {क्षमा चाहती हूँ } था और उन्हें ऐसी कृतियों के लिए सम्मानित करना यानि साहित्य का अपमान ही है...
मेरा सर्वाधिक रोष तो उन प्रकाशकों पर है जिन्होंने पुस्तक प्रकाशन के द्वार अच्छे  साहित्यकार के लिए एकदम बंद  कर दिए हैं ,यदि कोई बिना रूपया खर्च किए अच्छा साहित्य भी प्रकाशित करवाना चाहे तो उसे नानी याद आ जाती है.. दूसरी ओर २०-२५ हज़ार की राशि नकद देकर कुछ प्रकाशक बकवास साहित्य भी खुशी से छाप रहे है क्योंकि साहित्य के स्तर को बनाए रखने का ठेका उन्हें नही सौपा गया है...इसी के चलते बेकार साहित्य पुस्तकाकार रूप में आ जाता है और शहर  की आम-ख़ास संस्थाओं के सम्मान समारोह में इन सो कॉल्ड साहित्यकारों को सम्मान बाँट दिए जाते है..
      मेरा दूसरा प्रश्न है उन संस्थाओं  से जो इस तरह के सम्मान समारोह आयोजित करती हैं.. क्या ये समारोह केवल खाना पूर्ति के लिए ही आयोजित किए जाते है या वास्तव में अच्छे साहित्य से इनका कोई लेना-देना भी होता है? या आबंटित बजट को खर्च करने का रास्ता बनाया जाता है इनके ज़रिए? क्या पुस्तकों की जाँच के लिए समिति बनानी जरुरी नही है? सम्मान लायक पुस्तक न मिलने पर  संस्था के द्वारा यह विज्ञप्ति क्यों नहीं जारी की जाती कि " इस वर्ष कोई भी पुस्तक सम्मान लायक नही पाई गई? " क्या साहित्य के स्तर की रक्षा हेतु यहकदम उठाना जरुरी नहीं समझा जाता? 
 आजकल किताबें नही  पढी जाती यह गुहार लगाने वाले इन साहित्यकारों और इन संस्थाओं को यह समझना चाहिए कि बेकार साहित्य की बहुलता में अच्छा साहित्य कहीं गुम हो रहा है और जब पाठक के पल्ले ऐसी पुस्तकें पड़ती हैं तो वह पुस्तकों से दूर भानागे का ही प्रयास करता  है.. 
स्वांत सुखाय लिखने  और भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अधिकार सबको है मगर कुंदन बने बिना साहित्य के आभूषण में जड़कर उसे बदसूरत बनाने का अधिकार  किसी को नहीं मिलना चाहिए..

Monday, April 16, 2012

सपनों की सुबह

हर सुबह
जब दफ्तर जाती हुई भीड़ का एक हिस्सा बनकर
दो-चार होती हूँ सड़क के ट्रेफिक से
तब अंतर्मन में दबी एक सुप्त सी आशा
हौले से सिर उठने लगती है ..
जब कभी देखती हूँ किसी को
सुबह-सुबह जोगिंग करते
या बालकनी में बैठ चाय सुड़कते ,
अखबार पलटते ..तो
ईर्ष्या की नन्ही सी चिंगारी सुलग जाती है मन में
और फिर दबी सी वह आशा
फिर सिर उठाने लगती है ..
क्या कभी ऐसा होगा जब
मेरा समय होगा सिर्फ मेरा अपना
और होगा सब कुछ वैसा जैसे मैं चाहूँ..
जब मैं सोना चाहूँ, न हो अलार्म की टन-टन
जब मैं कुछ पढ़ना चाहूँ , न हो बर्तनों की खडखडाहट
ना हो सुबह की आपाधापी
ना हो शाम की खींचा तानी
बस घर हो सपनों के घर जैसा और
मैं बन जाऊं उस घर की रानी
बस के धचके के साथ ही जाग जाती हूँ
अपने टूटे सपने के किरचें समेटे
टूटी आशा को फीकी हँसी में समेटते
जानती हूँ मेरी ये सोच बेमानी है,
हर मिडिल क्लास नारी की
बस यही कहानी है ..
जहाँ सपने सिर्फ सपने होते हैं
और यथार्थ हर सपने पर भारी है ..
उस पर नारी की दोहरी जिम्मेवारी है
सब कुछ निभाकर भी बेचारी है ...
रोज सुबह इसी सपने के साथ
शुरू करती हूँ दिन अपना
और फिर दिखा देती हूँ माचिस उसे ..
और.. हर नई सुबह फिर थाम लेती हूँ
उम्मीद भरे सपने का दामन
की वो सुबह कभी तो आएगी ..

भारती पंडित

Friday, March 30, 2012

राम नवमी के पावन अवसर पर मेरे द्वारा रचित संक्षिप्त रामायण आपके सामने प्रस्तुत है |

संक्षिप्त रामायण
शरयू तटे अयोध्या नगरी ,राजा दशरथ जिसके प्रहरी |
तीन रानियाँ सुघड़- सलोनी ,राज मंत्री जिनके बहुज्ञानी ||

पुत्र प्राप्ति हित यज्ञ कराये, चार सुयोग्य पुत्र तेहि पायो |
गुरु वशिष्ठ ने शिक्षा दीन्ही ,बने कुमार योग्य अति ज्ञानी ||

विश्वामित्र आए दरबारा,लियो साथ द्वय ज्येष्ठ कुमारा |
दंडक वन में करे विहारा,करे त्राटिका असुर संहारा ||

मिथिला नंदिनी जनक कुमारी ,हुआ स्वयंवर जिसका भारी |
शिव धनुष्य पर डोर चढ़ाए ,जनक कुमारी पत्निवत पाए ||

बढे राम गुरु अनुमति पाई , शिव धनुष्य पर डोर चढ़ाई |
हर्षित जनक नंदिनी आई , राम कंठ जयमाल चढ़ाई ||

दशरथ बहुविधि करे विचारा, राज-पाट सब राम सम्हारा |
दासी मंथरा दुर्बुद्धि जानी , कैकयी भाई स्वयं अज्ञानी ||

राज-पाट सब भरत संहारे, राम अभी जाए वन द्वारे |
आर्तनाद करते रहिवासी , व्यथित अयोध्या छाई उदासी ||

चले राम पितु आज्ञा पाए ,सिया-लखन राम संग आए |
पंचवटी में कुटी बनाई,हर्षित मुदित सिया बहुताई ||

शूर्पनखा विचरती थी वन में , राम-लखन भाये तन-मन में |
प्राण जानकी हरने आई,शूर्पनखा ने नाक कटाई ||

शूर्पनखा भागी बंधुमुख , व्यथा कहे रावण के सम्मुख |
रावण मृग सुवर्ण पहुँचायो ,राम-लखन कुटि दूर करायो ||

भिक्षु वेश रावण करि जाई, सीता हरण दुष्ट करि पाई |
व्यथित राम भटके वन-वन में ,हनुमत मिले साधु के वसन में ||

संग सुग्रीव मित्रता कीन्हीं , अरज सभी उसकी सुन लीन्हीं |
बाली मार राज पुनः लीनो ,हनुमत खबर सिया की दीन्हों ||

राम जलधि उर सेतु बनाए,सिया मुक्ति हित दूत पठाए |
गर्वित रावण करे हुँकारा, युद्ध यही बस हेतु हमारा ||

हुई गर्जना वीरों की तब , दिशा चहुँ होती थी झंकृत |
गूँजे बहुल शस्त्र टंकारा, चहु दिसी मचाता हाहाकारा ||

डस दिन भयो युद्ध अति भारी ,सकल असुर सेना संहारी |
रघुवर बाण अचूक चलायो, मृत्यु द्वार रावण पहुँचायो ||

रावण मरे मुदित हुई लंका ,सिया-राम का बजता डंका |
प्रिया जानकी सम्मुख आई, हर्षित मुदित हुए रघुराई ||

सिया-लखन सह देस पधारे ,अवध नगर के भाग सँवारे |
मंगल गाए अवध नर-नारी ,रघुवर चरण लायो सुख भारी ||

bharti pandit


Tuesday, March 27, 2012

यादें

जीवन की हलचल में कोमल से कुछ पल
छूते है दिल को और बनती है यादें |
समतल सी राहों में नुकीले से पत्थर
चुभते हैं पग में और बनती है यादें |
गर्म दुपहरी में एक ठंडा सा झोंका
सहलाए तन को तो बनती है यादें |
चन्दा की चमचम को नटखट सा बादल
ढंकता है आकर तो बनती है यादें |
मीठी और कड़वी ,खट्टी और तीखी
रसना के स्वादों सी होती हैं यादें |
अपनाए उनको जो मीठी हैं यादें
दिल को दुखाए ,वो यादें भुला दें|

यादें

जीवन की हलचल में कोमल से कुछ पल
छूते है दिल को और बनती है यादें |
समतल सी राहों में नुकीले से पत्थर
चुभते हैं पग में और बनती है यादें |
गर्म दुपहरी में एक ठंडा सा झोंका
सहलाए तन को तो बनती है यादें |
चन्दा की चमचम को नटखट सा बादल
ढंकता है आकर तो बनती है यादें |
मीठी और कड़वी ,खट्टी और तीखी
रसना के स्वादों सी होती हैं यादें |
अपनाए उनको जो मीठी हैं यादें
दिल को दुखाए ,वो यादें भुला दें|

Saturday, March 24, 2012

वह नवप्रभात


देखती हूँ जब लोगों को सफलता का दावा करते
अपनी अयोग्यता को दिखावे में छिपाते
उधार की वर्णमाला से अपना शब्दकोश सजाते
तो सोचने पर विवश हो जाती हूँ क़ि
क्या ज्ञान सचमुच हार गया है ?

जब देखती हूँ ज्ञान को धन से हारते
सत्य की आत्म को झूठ से मारते
हर तरफ़ दंभ और धोखे की धुंध फैलाते
तो सोचने पर विवश हो जाती हूँ क़ि
क्या सत्य सचमुच हार गया है ?

तभी निराशा की धुंध में हल्की रौशनी नज़र आती है
खूठ की कालिख में सत्य की लौ टिमटिमाती है
अँधेरे में उम्मीद की किरण झिलमिलाती है
जब दूर प्रभात में मंदिर की घंटियाँ टनटनाती है
और कानों में बच्चों की किलकारी गूँज जाती है |

तब सोचती हूँ मैं क़ि
हर अमावस के बाद ही तो चाँद आता है ,
गहन अन्धकार के बाद ही तो सूरज जगमाता है
आज नहीं तो कल वह प्रभात तो आएगा
असत्य के तिमिर को चीर सत्य दमदमाएगा ,
अज्ञान की ज़ंजीर तोड़ ज्ञान का परचम लहराएगा ,
वह नव प्रभात आएगा |