Thursday, October 28, 2010

kavita

माँ तो बस माँ ही होती है

बच्चो को भरपेट खिलाती खुद भूखी ही सोती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

बच्चों की चंचल अठखेली देख देख खुश होती है

बचपन के हर सुन्दर पल को बना याद संजोती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

देख तरक्की बच्चों की वो आस के मोती पोती है

बच्चों की खुशहाली में वो अपना जीवन खोती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

बच्चों की बदली नज़रों से नहीं शिकायत होती है

जब-जब झुकता सर होठों पर कोई दुआ ही होती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

भारती पंडित


Tuesday, October 12, 2010

गरीब की लडकी
नहीं सोती है पूरी नींद
करती माँ की हिदायत का पालन
कि नींद में न आ जाये कोई सपना सलोना
जिसे पाने को मचल पड़े मन की नदी
अपने प्रवाह को अनियंत्रित करके ..

गरीब की लड़की
जानती है सीमाएं अपनी कि
अव्वल तो कोख में ही मार दी जाएगी ,
जी गयी तो अनचाही सी दुलार दी जाएगी ,
पढ़ना चाहेगी तो ब्याह दी जायेगी,
बोझ सी दूजे आँगन उतार दी जाएगी ....

गरीब की लड़की
फिर भी झपका ही लेती है उनींदी पलकें ,
देखने को सुनहले जीवन का सुकुमार सपना ,
क्योंकि बचपन में दादी की कहानी में सुना था कि
सपने भी कभी- कभी
सच हो जाया करते हैं....
भारती

Saturday, August 28, 2010

kavita

चाह एक शिक्षक की
जानती हूँ मैं कि दहलीज पर खड़ी हो तुम,
दस्तक देने को तैयार शायद करती हो इंतज़ार
कि द्वार खुलेगा और थाम लोगी हाथ मेरा
और ले जाओगी महाप्रयाण के उस अनंत पथ पर
जहां से वापसी संभव नहीं,आसान नहीं
पर हे मृत्यु की देवी, तुम्हीं से मांगती हूँ
जीवन के कुछ क्षणों का अमूल्य वरदान
यद्यपि नहीं है अधूरा कोई सपना
नहीं है अधूरी कोई भी चाह
ना ही है आस बिटिया के विवाह की ,
ना ही दिखाना है बेटे को सुनहली राह
बस इतना ही है काम बाकी कि
ज्ञान के जो अनमोल मोती सहेजे है
इस जीवन प्रवास में
डालती जाऊं किसी सुपात्र की झोली में
जो उन मोतियों को पल्लवित करें
बीजों की तरह और
लहलहा दे उन्हें उस वृक्ष की तरह
शिक्षा, सभ्यता और अनुशासन हो जिसके फल
संस्कार, देशप्रेम और जीवन मूल्यों से
जो हो सुगठित,सबल
बस इतना सी है स्वार्थ मेरा
क्योंकि फल खाने वालों के संतोष में
होगा एक हिस्सा मेरा भी
गुमनाम ही सही, कहीं तो स्मृति होगी मेरी
नींव सी ही सही , हस्ती तो होगी मेरी.
भारती पंडित

Wednesday, July 28, 2010

kavita

प्रेम है एक मासूम अहसास
- भारती पंडित

प्रेम है एक कोमल सी छुअन
जो बादल सी घुमड़ती है पल-पल
जो झरने सी झरती है झर-झर
जो बूँदों सी बरसती है झम-झम
या पायल सी खनकती है छम-छम।

प्रेम है एक मासूम अहसास
जो छुपा है सृष्टि के हर मन में
चँदा और बदली के आलिंगन में
धरती और गगन के मिलन में
या वृक्ष पर लता के आरोहण में।

प्रेम है एक शाश्वत सत्य
जो जीवन को देता है संबल
मन में जगाए विश्वास हर पल
जो हम फैलाए स्नेह का आँचल
तो ये धरती क्यों ना बने स्वर्ग-तल।

Wednesday, July 7, 2010

geet

हौसला उम्मीदों का

दिखता न हो जब किनारा कोई, मिलता न हो जब सहारा कोई
जला ले दीया खुद ही की रोशनी का ,कोई तुझसे बढ़कर सितारा नहीं

तूफां तो आए है आते रहेंगे, ग़मों के अँधेरे भी छाते रहेंगे,
आगाज़ कर रोशनी का कि तुझको , अंधेरों की महफ़िल गंवारा नहीं.

माना कि ये इतना आसां नहीं है, मगर सम्हले गिर के जो इन्सां वहीं है,
तारीके शब में उम्मीदों का परचम , कहीं इससे बेहतर नज़ारा नहीं .
भारती पंडित

Sunday, June 27, 2010

बिटिया हमारी
यूं मजबूरियों का बने ना तमाशा ,दो सिक्कों की खातिर कोई घर न तोड़ो
न तुम जान से खेलो ,ये रिश्तें न छीनो
ये कहता है इंसानियत का तकाजा , किसी जिन्दगी का उजाला न छीनों

जो जन्मे हैं बेटा तो गूंजे है सरगम
वही घर में बिटिया के आने पे मातम
क्यों माता ही हाथों में धरती है खंजर
ये बिटिया ही तो घर को घर है बनाती
उसी से सुखों का निवाला न छीनों (१)

सुबह तो हुई पर ये कैसा नजारा
कहीं रोती बहुएँ, कहीं मरती बाला
क्यूं बनती हैं नारी सितम का निवाला
है जीने का हक़ तो उन्हें भी है आखिर
किसी से किसी का सहारा ना छीनों (२)
भारती पंडित

Monday, June 14, 2010

इमारते

कल तक जहां दिखाते थे हरे लहलहाते खेत
अब नजर आने लगे हैं मशीनी दानव वहां
धरती के सीने पर चलेंगे पहेये बुलडोजर के
एक ही दिन में धरती बंजर वीरान हो जाएगी .
फिर शुरू होगा खेल खरीदो-फरोख्त का
और माँ सी उपजाऊ धरती बोली की भेंट चढ़ जाएगी ,
धन्ना सेठ ले आएगा आदमियों की फौज भारी
उपजाऊ खेतों को मिटा लम्बी इमारतें तानी जाएँगी .
घर -बाज़ार-स्कूल अस्पताल, लोगों की हलचल होगी
मगर इन सब में गुम हो जाएगी कराह धरती की.
क्या फिर पके दानों की महक हवा को महका पाएगी?
क्या फिर बैलों की घंटियाँ कानों में गूँज पाएंगी ?
शोरगुल में डूबे मन में क्या कभी ये सोच आएगी?
शाश्वत प्रकृति को तो नष्ट किया हमने ,अब
ये नश्वर इमारतें कितना साथ निभाएंगी?

भारती पंडित
इंदौर