Wednesday, February 9, 2011

kavita

सपने
उस दिन जब मैं पहली बार गया पाठशाला
और उस दिन जब मैंने सीखा ककहरा
ढेरों अधूरे सपने
धम से आ गिरे थे मेरी झोली में ..
दादा के सपने, दादी के सपने
माँ के सपने , पिताजी के सपने
वे सब मानो जोह रहे थे
मेरे बड़े होने की बाट,
कि उनके भी सपनों को
मिल जाये मंजिल...
आज उनके सपनों को जीता मैं
सोचता हूँ कि देख लूं
अपने भी कुछ सपने ,
और उन्हें पूरा भी
मैं ही कर डालूँ ..
डरता हूँ कि मेरे सपने कहीं
मेरे नन्हें की आँखों में घर न बना ले ...

भारती पंडित
इंदौर

Thursday, January 13, 2011

kavita

[1] औरत हूँ मैं.
अल-सुबह जब सूरज खोलता भी नहीं है
झरोखे आसमान के
चिडिया करवटें बदलती हैं
अपने घरोंदों में
उसके पहले उठ जाती हूँ मैं
घर को सजाती संवारती
सुबह के काम समेटती
चाय के कप हाथ में लिए
सबको जगाती हूँ मैं
जानती हूँ, औरत हूँ मैं ........
बच्चों की तैयारी,
पतिदेव की फरमाइशें
रसोई की आपा धापी
सासू माँ की हिदायतें
इन सब के बीच खुद को
समेटती सहेजती हूँ मैं.
कोशिश करती हूँ कि माथे पर
कोई शिकन न आने पाए
जानती हूँ औरत हूँ मैं.....
घर, दफ्तर,, मायका ससुराल
गली, कूचा ,मोहल्ला पड़ोस
सबके बीच संतुलन बनाती मैं
चोटों को दुलार, बड़ों को सम्मान
अपनापन सभी में बाँटती मैं
चाहे प्यार के चंद मीठे बोल
न आ पाए मेरी झोली में
जानती हूँ औरत हूँ मैं .......
कोई ज़ुबां से कहे न कहे
मेरी तारीफ़ के दो शब्द
भले ही ना करे कोई
मेरे परिश्रम की कद्र
अपने घर में अपनी अहमियत
जानती हूँ ,पहचानती हूँ मैं
घर जहां बस मैं हूँ
हर तस्वीर में दीवारों में
बच्चो की संस्कृति संस्कारों में
रसोई में, पूजाघर में
घर की समृद्धी, सौंदर्य में
पति के ह्रदय की गहराई में
खुशियों की मंद पुरवाई में
जानती हूँ बस मैं ही मैं हूँ
इसीलिए खुश होती हूँ
कि मैं एक औरत हूँ.

bharti pandit

Monday, November 29, 2010

kavita

बिटिया की विदाई पर पिता का पत्र

मेरी नन्ही कली
अभी कल ही की तो बात है
परी सी आई थी आँगन में मेरे
जीवन को नंदनवन बनाने ,
तुतलाते शब्दों से कानों को
अमृतपान कराने ,
अभी कल ही की तो बात है.

तेरी खिलखिलाहटे जो जगाती थी घर को,
तेरी अठखेलियाँ जो मोहती थी मन को ,
तेरा रोना- हंसना रूठना -मनाना ,
मनोजीवित हो जाता था घर ,
अभी कल ही की तो बात थी .

बढ़ाने लगी तू पुष्पलता सी ,
रिश्तों के नए रंग सुवासित करती ,
कभी दोस्तों सा अधिकार जताती ,
कभी माँ सी डांट लगाती ,
कभी बची सी मचल भी जाती ,
अभी कल ही की तो बात है .

आज विदाई की इस बेला में ,
तेरा पिता निस्तब्ध अकेला है ,
ओंठों पर है आशीषों की झड़ी,
आँखों में स्मृतियों का मेला है ,
आज जो हुई पराई ,रौनक थी मेरे घर की ,
हाँ अभी कल ही की तो बात है ..

भारती पंडित

Thursday, November 4, 2010

kavita

कविता
इस बार दिवाली पर
इस बार दिवाली पर
घर को खूब सजाना,
झिलमिल दीपों से दमकाना ,
बस एक दीप सहेज लेना
उस अंधेरी दहलीज़ के लिए
जिसका मासूम चिराग
हाल ही में बुझ गया है .

इस बार दिवाली पर
खूब खुशियां मनाना ,
मिलना और मिलाना ,
बस कुछ पकवान सहेज लेना
उस घर के बच्चों के लिए
जिनका त्योहार भी जूठन पर मनता है.

इस बार दिवाली पर
अपने घर की पूजा के साथ
माँ लक्ष्मी का आह्वान करना ,
हे माँ इस दिवाली पर
उस मजदूर बस्ती में भी जाना ,
जहां गरीबी करती है तांडव ,
चरित्र -संस्कार चढ़ते हैं भेंट भूख की ,
आशा की उजास वहां भी फैलाना ,
माँ , उस बस्ती में भी जाना .
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भारती पंडित
३०१, स्वर्ण प्लाज़ा
स्कीम ११४-१, पावर हाउस के पास
प्लाट ११०९ ,ए.बी.रोड
इंदौर
मोबाइल :9926099018


कविता
आओ ज्योत जलाए

आओ हर दहलीज़ पर
जगमग ज्योत जलाएं .
गहन निराशा के तम में
एक आस किरण दमकाएं .
अज्ञान-अशिक्षा के तम को
शिक्षा की लौ से दूर भगाएं .
हिंसा में तपते जीवन को
शान्ति वृक्ष की छांव दिखाएं .
दुःख से बंजर बनते घर को
नंदन वन सा महकाएं ,
आओ ज्योत जलाएं.
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Thursday, October 28, 2010

kavita

माँ तो बस माँ ही होती है

बच्चो को भरपेट खिलाती खुद भूखी ही सोती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

बच्चों की चंचल अठखेली देख देख खुश होती है

बचपन के हर सुन्दर पल को बना याद संजोती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

देख तरक्की बच्चों की वो आस के मोती पोती है

बच्चों की खुशहाली में वो अपना जीवन खोती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

बच्चों की बदली नज़रों से नहीं शिकायत होती है

जब-जब झुकता सर होठों पर कोई दुआ ही होती है

माँ तो बस माँ ही होती है .

भारती पंडित


Tuesday, October 12, 2010

गरीब की लडकी
नहीं सोती है पूरी नींद
करती माँ की हिदायत का पालन
कि नींद में न आ जाये कोई सपना सलोना
जिसे पाने को मचल पड़े मन की नदी
अपने प्रवाह को अनियंत्रित करके ..

गरीब की लड़की
जानती है सीमाएं अपनी कि
अव्वल तो कोख में ही मार दी जाएगी ,
जी गयी तो अनचाही सी दुलार दी जाएगी ,
पढ़ना चाहेगी तो ब्याह दी जायेगी,
बोझ सी दूजे आँगन उतार दी जाएगी ....

गरीब की लड़की
फिर भी झपका ही लेती है उनींदी पलकें ,
देखने को सुनहले जीवन का सुकुमार सपना ,
क्योंकि बचपन में दादी की कहानी में सुना था कि
सपने भी कभी- कभी
सच हो जाया करते हैं....
भारती

Saturday, August 28, 2010

kavita

चाह एक शिक्षक की
जानती हूँ मैं कि दहलीज पर खड़ी हो तुम,
दस्तक देने को तैयार शायद करती हो इंतज़ार
कि द्वार खुलेगा और थाम लोगी हाथ मेरा
और ले जाओगी महाप्रयाण के उस अनंत पथ पर
जहां से वापसी संभव नहीं,आसान नहीं
पर हे मृत्यु की देवी, तुम्हीं से मांगती हूँ
जीवन के कुछ क्षणों का अमूल्य वरदान
यद्यपि नहीं है अधूरा कोई सपना
नहीं है अधूरी कोई भी चाह
ना ही है आस बिटिया के विवाह की ,
ना ही दिखाना है बेटे को सुनहली राह
बस इतना ही है काम बाकी कि
ज्ञान के जो अनमोल मोती सहेजे है
इस जीवन प्रवास में
डालती जाऊं किसी सुपात्र की झोली में
जो उन मोतियों को पल्लवित करें
बीजों की तरह और
लहलहा दे उन्हें उस वृक्ष की तरह
शिक्षा, सभ्यता और अनुशासन हो जिसके फल
संस्कार, देशप्रेम और जीवन मूल्यों से
जो हो सुगठित,सबल
बस इतना सी है स्वार्थ मेरा
क्योंकि फल खाने वालों के संतोष में
होगा एक हिस्सा मेरा भी
गुमनाम ही सही, कहीं तो स्मृति होगी मेरी
नींव सी ही सही , हस्ती तो होगी मेरी.
भारती पंडित